सड़क

मैं बैठा था सड़क के किनारे.
किसीके बेतहाशा इंतजार में..
आसमान से ठंडी हवा चल रहीथी...

उसकी मदहोश खुशबू मेरे जेहेन में घुलीसी जा रहीथी ..
वो हवा ...वो परछाई...वो मदहोशी ... वो मोहोब्बत ...वो सन्नाटा...
कही दूर बदलो की चट्टान थी,
जिसमेसे एक झरना बहेते हुए आया;
शायद मेरी प्यास बुझाने केलिए..
लेकिन मेरे अकेलेपन को पागलपन में बदल गया
और तन्हाई मेरी जरुरत बना गया!

असम से ठंडी हवा चल रहीथी!

मेरी तमन्नाओ को मेरेही जेहेन में समेटने केलिए...
वो सड़क ...वो ख्वाब ...वो जरुरत ...
ये सब मेरी मोहोब्बत थी...मेरीही तन्हाई थी!

-मयूर खैरे